Saturday, 8 October 2022

ANGER FREE SCHOOL (Hindi)

स्कूलों में गुस्से की इंट्री बंद, खुशमिजाज माहौल में शिक्षक-छात्र सब मुस्कुराएंगे
बच्चों के व्यवहार में आया परिवर्तन माहौल को देगा बेहतर दिशा । घर में भी बच्चों से सीख लेकर माता-पिता का रवैया सही रहेगा
स्कूलों में बच्चों के व्यवहार का असर उनकी पढ़ाई के साथ-साथ उनके जीवन पर भी पड़ रहा है। घरेलू कारण या फिर स्कूल के तनाव की वजह से बच्चों में चिड़चिड़ापन और गुस्सा बढ़ रहा है। जिसके चलते बच्चे अक्सर गुस्से में आकर कुछ ऐसा कर जाते हैं कि बाद में उसका खामियाजा या तो उसे ही भुगतना पड़ता है या फिर स्कूल और उसके अविभावक नतीजा झेलते हैं। इसे देखते हुए सीबीएसई ने कुछ ऐसे कदम उठाए हैं कि कम से कम बच्चे स्कूल में तो खुशनुमा माहौल में रह सके।
स्कूलों में गुस्से की इंट्री बंद, खुशमिजाज माहौल में शिक्षक-छात्र सब मुस्कुराएंगे
नो एंग्री जोन बनेंगे स्कूल
सीबीएसई के सचिव अनुराग त्रिपाठी ने अपने संबद्ध विद्यालयों को एक पत्र भेजा है जिसमें ज्वॉयफुल लर्निंग पर जोर देने के साथ कहा है कि स्कूल से जुड़ा हर वर्ग गुस्सा नहीं करेगा। स्कूलों के बाहर साइनबोर्ड लगाए जाएंगे जिसमें लिखा होगा- नो एंगर जोन या एंगर फ्री जोन। नए प्रयासों के तहत अब शिक्षक और छात्र-छात्राएं एक दूसरे से क्रोध नहीं करेंगे और न ही शिक्षक-शिक्षिकाएं बच्चों को आंख दिखाएंगे, बल्कि इन्हें देखकर मुस्कुराएंगे। स्कूल के अंदर सख्त अनुशासन नहीं बल्कि हंसी-खेल और
खुशमिजाजी के माहौल में पढ़ाई कराई जाएगी।

सीबीएसई का मानना है कि ऐसा करने से काफी सकारात्मक बदलाव आएगा। बच्चों को कुछ इस तरह प्रशिक्षित किया जाएगा कि वह घर में भी अपने मम्मी-डैडी से किसी बात पर न झगड़ें। अभिभावक भी गुस्सा करना छोड़ दें। इससे स्कूल के साथ-साथ घर का माहौल भी बेहतर बनेगा। ज्यादातर घरों में बच्चों के गुस्से से बीपी और सिरदर्द की समस्या रहती है। स्कूल का माहौल अच्छा होने से बच्चों के घर का माहौल भी सुधरेगा।
बच्चों को होगा लाभ
सीबीएसई के मुताबिक खुशनुमा माहौल में बच्चों में पढ़ाई लिखाई के साथ-साथ हर बात जल्दी सीखते हैं। स्कूल में गुस्सा करना छोड़ेंगे तो घर में भी बड़ों को ऐसा ही सिखाएंगे। भविष्य में बेहतर माहौल मिल सकेगा। बोर्ड की ओर से शिक्षकों और अभिभावकों को सलाह दी गई है कि वह खाली समय में बच्चों को देखें। उनसे हल्के-फुल्के सवाल करें। कुछ ऐसा करें जिससे वह हंसने पर मजबूर हों।
जैसे 10 तक गिनना और अपनी सांसों के बारे में सोचना, ऐसी स्थिति से दूर जाना जो आपको गुस्सा दिला रही हो, कभी-कभी आपको किसी स्थिति पर बहुत जल्दी प्रतिक्रिया करने से रोकने में मदद मिल सकती है, या यह आपको सांस लेने और अच्छे विकल्पों के बारे में सोचने के लिए कुछ समय दे सकती है। बना सकते हैं।

अपने आप को कुछ अच्छी सलाह दें (आत्म-चर्चा)। आत्म-चर्चा का मतलब है कि आप अपने आप से वे बातें कहते हैं जो एक अच्छा दोस्त आपको शांत करने के लिए कहेगा, जैसे, "शांत हो जाओ," "शायद यह इतना बुरा नहीं है," या "इसे जाने दो।" इसका सबसे अच्छा उपयोग तब किया जाता है जब आप पहली बार नोटिस करते हैं कि आप गुस्से में हैं (भावनात्मक प्रतिक्रिया चरण)। इसका उद्देश्य आपको शांत करने में मदद करना है। यदि आप स्वयं को किसी भी सोच त्रुटि (तर्क का प्रयोग करें) का उपयोग करते हुए देखते हैं तो आत्म-चर्चा का प्रयोग करें।
हास्य की तलाश करें - बिना किसी का मज़ाक उड़ाए। कभी-कभी हम मूर्खतापूर्ण कारणों से क्रोधित हो जाते हैं जिन्हें समझाना कठिन होता है। हो सकता है कि आप वास्तव में गुस्सा भी नहीं करना चाहते। कभी-कभी, अगर कोई खतरा नहीं है, तो आप 10 तक गिन सकते हैं और कल्पना कर सकते हैं कि यह कैसा दिखना चाहिए अगर यह पूरी गुस्से वाली स्थिति कुछ ऐसी थी जिसे आप टीवी कॉमेडी में देख रहे थे। कभी-कभी, जब आप वास्तव में इसके बारे में सोचते हैं, तो कुछ चीजें जो हमें गुस्सा दिलाती हैं, वास्तव में मूर्खतापूर्ण लग सकती हैं। हालाँकि, याद रखें कि यदि आप किसी और के साथ गुस्से की स्थिति में हैं, तो हो सकता है कि वे इसे उसी समय मज़ेदार न समझें, जैसा आप करते हैं। यह आमतौर पर सबसे अच्छा काम करता है यदि आप खुद पर हंस सकते हैं।

ये रणनीतियाँ आपके छात्रों को गुस्से से बाहर निकलने और उनकी मजबूत भावनाओं से निपटने के अधिक रचनात्मक तरीके खोजने में मदद करने में प्रभावी हो सकती हैं। लेकिन कुछ छात्रों के लिए, आपके सर्वोत्तम प्रयासों के बावजूद क्रोध के मुद्दे आक्रामकता में बदल सकते हैं। किसी छात्र को किसी के लिए रेफ़रल की आवश्यकता कब हो सकती है?
प्रशासक, परामर्शदाता, या मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर? एंड्रयू कोल और आरोन शुप ने अपनी पुस्तक, रिकॉग्निज एंड रिस्पॉन्ड टू इमोशनल एंड बिहेवियरल इश्यूज इन द क्लासरूम में निम्नलिखित सलाह दी:

अपने आप से पूछें: क्या यह छात्र अपने लिए या दूसरों के लिए खतरा पैदा कर रहा है? क्या उनकी आक्रामकता गंभीरता से बढ़ रही है? एक रेफरल पर विचार करें जब:

समस्या में प्रत्यक्ष धमकी, शारीरिक हिंसा, या अधिक हल्के आक्रामक व्यवहार का एक पैटर्न शामिल है जो आपकी सिखाने की क्षमता को बाधित करता है। सुरक्षा और अनुशासनात्मक उपायों के लिए हमेशा अपने स्कूल की नीतियों का पालन करें।

आप इस बात से चिंतित हैं कि आपकी कक्षा के बाहर या स्कूल के बाहर छात्र को चोट पहुँच रही है। यहां तक ​​कि अगर आपके पास स्पष्ट सबूत नहीं हैं, तो भी स्कूल काउंसलर या प्रशासक के साथ अपनी चिंताओं के बारे में बात करने में कोई हर्ज नहीं है। यदि छात्र के पास पेशेवर हैं, तो उनके साथ खुला संचार रखें (यह मानते हुए कि छात्र के अभिभावकों ने उन लोगों के लिए आपसे बात करने के लिए सहमति पर हस्ताक्षर किए हैं)। आपके प्रयासों की सराहना की जाएगी क्योंकि आप बच्चे को लगभग किसी और की तुलना में अधिक देखते हैं, और किसी भी व्यवहारिक हस्तक्षेप की सफलता सेटिंग्स में स्थिरता पर निर्भर करती है। दूसरे शब्दों में, व्यापक उपचार कार्यक्रम की सफलता के लिए आपकी भागीदारी महत्वपूर्ण है।
याद रखें कि इस तरह की गंभीर समस्या के साथ, आपको खुद को पेशेवरों की एक टीम के सदस्य के रूप में देखना चाहिए जो छात्र और परिवार के साथ काम कर रहे हैं। आप इस टीम का एक अभिन्न हिस्सा हैं, लेकिन ऐसा नहीं लगता कि आप इस समस्या को अपने दम पर हल कर सकते हैं।
साथ ही, ध्यान रखें: क्योंकि मौखिक और शारीरिक हिंसा का कई लोगों पर गहरा प्रभाव हो सकता है, इसलिए दूसरी राय लेने या वयस्कों के नेटवर्क को व्यापक बनाने में कभी भी दर्द नहीं होता है जो छात्र का समर्थन कर सकते हैं।

एक समय या किसी अन्य पर, लगभग सभी को क्रोध प्रबंधन रणनीतियों का उपयोग करने की आवश्यकता होती है। आपके और आपके विद्यार्थियों के लिए कौन-सी कुछ रणनीतियाँ कारगर रही हैं? नीचे दी गई टिप्पणियों में अपनी युक्तियां साझा करें!

Munshi Premchand


हिंदी साहित्य के सबसे अधिक पढ़े जाने वाले और लोकप्रिय लेखक प्रेमचंद ने हिंदी में कहानियों और उपन्यासों को सुदृढ़ आधार दिया। इनकी कहानियां भारतीय समाज की कुरीतियों और विडंबनाओं पर आधारित हैं।

मुंशी प्रेमचंद का जन्म वाराणसी के निकट लमही गांव में 31 जुलाई, 1880 में हुआ था। मुंशी प्रेमचंद जी का मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। इन्होंने अपने प्रिय मित्र मुंशी दयानारायण निगम के सुझाव पर अपना नाम धनपतराय की जगह प्रेमचंद रखा और इसी नाम से कहानियों और उपन्यासों के रूप में अपने विचारों और भावों को अभिव्यक्ति दी।


इनके पिता का नाम अजायब राय था। इनके पिता डाकखाने में निगरानी करते थे। इनकी माता का नाम आनंदी था। उस समय बाल विवाह का चलन था। इसलिए प्रेमचंद जी का विवाह भी 15 वर्ष की उम्र में हो गया था। जब गांधी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन शुरू किया तो उनके विचारों से प्रभावित होकर इन्होंने अपनी सरकारी नौकरी से त्याग-पत्र दे दिया।


मुंशी प्रेमचंद जी ने कई प्रसिद्ध उपन्यास लिखे-जैसे, सेवासदन, निर्मला, गोदान, गबन, कर्मभूमि और रंगभूमि आदि। इनकी कहानियों को ‘मानसरोवर’ में, जो एक संग्रह ग्रंथ है. बाद में एक साथ प्रकाशित किया गया।


बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने इन्हें ‘उपन्यास सम्राट‘ कहकर संबोधित किया है। इनका साहित्य पढ़ते समय ऐसा लगता है, मानो आप उस दृश्य को अपनी खुली आंखों से देख रहे हों, जिसका चित्रण रचनाकार ने किया है।

इनकी कहानियों या उपन्यासों के पात्र कल्पना की उपज नहीं, बल्कि पूर्णरूप से सजीव लगते हैं। इसीलिए विश्व का साहित्य जगत इनका विशेष रूप से सम्मान करता है। ये हिंदी सिनेमा के सबसे अधिक लोकप्रिय साहित्यकारों में से एक हैं। इनका 8 अक्टूबर, 1936 को वाराणसी में निधन हो गया।

मुंशी प्रेमचंद की कहानी कौन कौन सी है?
आत्माराम,2. दो बैलों की कथा,3. आल्हा,4. इज्जत का खून,5. इस्तीफा,6. ईदगाह,7. कप्तान साहब,8. कर्मों का फल,9. क्रिकेट मैच,10. कवच,11. क़ातिल,12. कोई दुख न हो तो बकरी खरीद ला,13. गैरत की कटार,14. गुल्‍ली डण्डा,15. घमण्ड का पुतला,16. ज्‍योति,17. जेल,18. जुलूस,19. झांकी,20. ठाकुर का कुआं,21. त्रिया-चरित्र,22. तांगेवाले की बड़,23. दण्ड,24. दुर्गा का मन्दिर,25.पूस की रात,26. बड़े घर की बेटी,27. बड़े बाबू,28. बड़े भाई साहब,29. बन्द दरवाजा,30. बोहनी,31. मैकू,32. मन्त्र,33.सौत,34. नमक का दरोगा,35.सवा सेर गेहुँ,36.कफ़न,37.पंच परमेश्वर I

मुंशी प्रेमचंद के प्रमुख उपन्यास कौन कौन से है?
1.रूठी रानी,2.वरदान,3. सेवा सदन,4. प्रेमाश्रम,5. रंगभूमि,6. निर्मला,7. प्रतिज्ञा,8. कर्मभूमि,9. गबन,10. गोदान,11. मंगलसूत्र (अधूरा) जो कि बाद में उनके पुत्र ने पूरा किया था I

BLOOM TAXONOMY (Hindi)


ब्लूम के वर्गीकरण के आधार पर ही कई मनोवैज्ञानिकों ने अपने परीक्षण किए और वह अपने परीक्षणों में सफल भी हुए। इस आधार पर यह माना जा सकता है कि ब्लूम का यह सिद्धांत काफी हद तक सही हैं। बेंजामिन ब्लूम के वर्गीकरण (bloom taxonomy) में संज्ञानात्मक उद्देश्य, भावात्मक उद्देश्य, मनोशारीरिक उद्देश्य समाहित हैं। सर्वप्रथम हम संज्ञानात्मक उद्देश्य (Cognitive Domain) की प्राप्ति के लिए निम्न बिंदुओं को जानिंगे –
संज्ञानात्मक उद्देश्य Cognitive Domain
1. ज्ञान (Knowledge) – ज्ञान को ब्लूम ने प्रथम स्थान दिया क्योंकि बिना ज्ञान के बाकी बिंदुओं की कल्पना करना असंभव हैं। जब तक किसी वस्तु के बारे में ज्ञान (knowledge) नही होगा तब तक उसके बारे में चिंतन करना असंभव है और अगर संभव हो भी जाये तो उसको सही दिशा नही मिल पाती। इसी कारण ब्लूम के वर्गीकरण में इसकी महत्ता को प्रथम स्थान दिया गया।
                Benjamin Bloom 

2. बोध (Comprehensive) – ज्ञान को समझना उसके सभी पहलुओं से परिचित होना एवं उसके गुण-दोषों के सम्बंध में ज्ञान अर्जित करना।

3. अनुप्रयोग (Application) – ज्ञान को क्रियान्वित (Practical) रूप देना अनुप्रयोग कहलाता हैं प्राप्त किये गए ज्ञान की आवश्यकता पड़ने पर उसका सही तरीके से अपनी जिंदगी में उसे लागू करना एवं उस समस्या के समाधान निकालने प्राप्त किये गए ज्ञान के द्वारा। यह ज्ञान को कौशल (Skill) में परिवर्तित कर देता है यही मार्ग छात्रों को अनुभव प्रदान करने में उनकी सहायता भी करता हैं।

4. विश्लेषण (Analysis) – विश्लेषण से ब्लूम का तात्पर्य था तोड़ना अर्थात किसी बड़े प्रकरण (Topic) को समझने के लिए उसे छोटे-छोटे भागों में विभक्त करना एवं नवीन ज्ञान का निर्माण करना तथा नवीन विचारों की खोज करना। यह ब्लूम का विचार समस्या-समाधान में भी सहायक हैं।

5. संश्लेषण (Sysnthesis) – प्राप्त किये गए नवीन विचारो या नवीन ज्ञान को जोड़ना उन्हें एकत्रित करना अर्थात उसको जोड़कर एक नवीन ज्ञान का निर्माण करना संश्लेषण कहलाता हैं।

6. मूल्यांकन (Evalution) – सब करने के पश्चात उस नवीन ज्ञान का मूल्यांकन करना कि यह सभी क्षेत्रों में लाभदायक है कि नहीं। कहने का तात्पर्य है कि वह वैध (Validity) एवं विश्वशनीय (Reliebelity) हैं या नहीं। जिस उद्देश्य से वह ज्ञान छात्रों को प्रदान किया गया वह उस उद्देश्य की प्राप्ति करने में सक्षम हैं कि नही यह मूल्यांकन द्वारा पता लगाया जा सकता हैं।

2001 रिवाइज्ड ब्लूम वर्गीकरण |Revised Bloom Taxonomy
ब्लूम के वर्गीकरण (Bloom Taxonomy) में संशोधित रूप एंडरसन और कृतवोल ने दिया। इन्होंने वर्तमान की आवश्यकताओं को देखते हुए उसमे कुछ प्रमुख परिवर्तन किये। जिसे रिवाइज्ड ब्लूम वर्गीकरण (Revised bloom taxonomy) के नाम से जाना जाता हैं।

1. स्मरण (Remembering) – प्राप्त किये गये ज्ञान को अधिक समय तक अपनी बुद्धि (Mind) में संचित रख पाना एवं समय आने पर उसको पुनः स्मरण (recall) कर पाना स्मरण शक्ति का गुण हैं।

2. समझना (Understanding) – प्राप्त किया गया ज्ञान का उपयोग कब, कहा और कैसे करना है यह किसी व्यक्ति के लिए तभी सम्भव हैं जब वह प्राप्त किये ज्ञान को सही तरीके से समझे।

3. लागू करना (Apply) – जब वह ज्ञान समझ में आ जाये जब पता चल जाये कि इस ज्ञान का प्रयोग कब,कहा और कैसे करना हैं तो उस ज्ञान को सही तरीके से सही समय आने पर उसको लागू करना।

4. विश्लेषण (Analysis) – उस ज्ञान को लागू करने के पश्चात उसका विश्लेषण करना अर्थात उसको तोड़ना उसको छोटे-छोटे भागों में विभक्त करना।

5. मूल्यांकन (Evaluate) – विश्लेषण करने के पश्चात उसका मूल्यांकन करना कि जिस उद्देश्य से उसकी प्राप्ति की गयी है वह उस उद्देश्य की प्राप्ति कर रहा हैं या नहीं इसका पता हम उसका मूल्यांकन करके कर सकते हैं।

6. रचना (Creating) – मूल्यांकन करने के पश्चात उस स्मरण में एक नयी विचार का निर्माण होता हैं जिससे एक नवीन विचार की रचना होती हैं।
Meaning of Bloom Taxonomy in Hindi
भावात्मक उद्देश्य (Affective Domain)
Bloom taxonomy के अंतर्गत भावात्मक उद्देश्य (Affective Domain)का निर्माण क्रयवाल एवं मारिया ने 1964 में किया। इन्होंने छात्रों के भावात्मक पक्ष पर ध्यान देते हुए कुछ प्रमुख बिंदुओं को हमारे सम्मुख रखा। भावात्मक पक्ष से तात्पर्य हैं कि उस प्रत्यय (Topic) के प्रति छात्रों के भावात्मक (गुस्सा,प्यार,चिढ़ना, उत्तेजित होना, रोना आदि) रूप का विकास करना।

1. अनुकरण (Receiving) – भावात्मक उद्देश्य (Affective Domain) की प्राप्ति के लिए सर्वप्रथम बालको को अनुकरण (नकल) के माध्यम से ज्ञान प्रदान करना चाहिए। एक अध्यापक को छात्रों को पढ़ाने के समय उस प्रकरण का भावात्मक पक्ष को महसूस कर उसको क्रियान्वित रूप देना चाहिये जिससे छात्र उसका अनुकरण कर उसको महसूस कर सकें।

2. अनुक्रिया (Responding) – तत्पश्चात अनुकरण कर उस अनुकरण के द्वारा क्रिया करना अनुक्रिया कहलाता हैं।

3. अनुमूल्यन (Valuing) – उस अनुक्रिया के पश्चात हम उसका मूल्यांकन करते है कि वह सफल सिध्द हुआ कि नहीं।

4. संप्रत्यय (Conceptualization) – हम उसके सभी पहलुओं पर एक साथ विचार करते हैं।

5. संगठन (Organization) – उस प्रकरण को एक स्थान में रखकर उसके बारे में चिंतन करते हैं उसमें विचार करना शुरू करते हैं।

6. चारित्रीकरण (Characterisation) – तत्पश्चात हम उस पात्र का एक चरित्र निर्माण करते हैं जिससे हमारे भीतर उसके प्रति एक भाव उत्त्पन्न होता हैं जैसे गुंडो के प्रति गुस्से का भाव हीरो के प्रति सहानुभूति वाला भाव आदि।

इन सभी बिंदुओं को हम एक माध्यम के द्वारा समझ सकते है जब हमारा बर्थडे (Birthday) होता हैं और कोई व्यक्ति हमारे लिए उपहार (Gift) लाता है तो हम उस समय खुश होते है या उसको धन्यवाद बोलते हैं अर्थात अनुक्रिया करते हैं गिफ्ट प्राप्ति के लिये। तत्पश्चात जब सभी व्यक्ति चले जाते है तो हम उसको देखते हैं और अंदाजा लगाते है कि इसका मूल्य कितना होता अर्थात उसकी Valuing करते हैं उसके बाद उसको सही जगह रखने के लिए उचित जगह निश्चित करते हैं अर्थात उसको संगठित करते हैं तत्पश्चात हम उस गिफ्ट देने वाले व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करते हैं कि उसके लिए हम कितने महत्वपूर्ण है( यह एक सिर्फ उदाहरण हैं जिसके माध्यम से आपको समझाया जा रहा हैं सच तो यह है कि इस प्रकार किसी के चरित्र का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। )
मनोशारीरिक उद्देश्य (Psychomotor Domain)
Bloom taxonomy के अंतर्गत मनोशारीरिक उद्देश्य का निर्माण सिम्पसन ने 1969 में किया। इन्होंने ज्ञान के क्रियात्मक पक्ष पर बल देते हुए निन्म बिंदुओं को प्रकाशित किया।

1. उद्दीपन (Stimulation) – उद्दीपन से आशय कुछ ऐसी वस्तु जो हमे अपनी ओर आकर्षित करती हैं तत्पश्चात हम उसे देखकर अनुक्रिया करतें हैं जैसे भूख लगने पर खाने की तरफ क्रिया करते हैं इस उदाहरण में भूख उद्दीपन हुई जो हमें क्रिया करने के लिये उत्तेजित कर रहीं हैं।

2. कार्य करना (Manipulation) – उस उद्दीपन के प्रति क्रिया हमको कार्य करने पर मजबूर करती हैं।

3. नियंत्रण (Control) – उस क्रिया पर हम नियंत्रण रखने का प्रयास करते हैं।

4. समन्वय (Coordination) – उसमें नियंत्रण रखने के लिए हम उद्दीपन ओर क्रिया के मध्य समन्वय स्थापित करते हैं।

5. स्वाभाविक (Naturalization) – वह समन्वय करते करते एक समय ऐसा आता हैं कि उनमें समन्वय स्थापित करना हमारे लिए सहज हो जाता हैं हम आसानी के साथ हर परिस्थिति में उनमें समन्वय स्थापित कर पाते हैं वह हमारा स्वभाव बन जाता हैं।

6. आदत ( Habit formation) – वह स्वभाव में आने के पशचात हमारी आदत बन जाता है। ऐसी परिस्थिति दुबारा आने के पश्चात हम वही क्रिया एवं प्रतिक्रिया हमेशा करते रहते हैं जिससे हमारे अंदर नयी आदतों का निर्माण होता हैं।

निष्कर्ष Conclusion –
ब्लूम के वर्गीकरण में ब्लूम ने छात्रों के ज्ञान एवं बौद्धिक पक्ष पर पूरा ध्यान केंद्रित किया हैं। वह छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिये बौद्धिक विकास पर अध्यधिक बल देते हैं। उनका यह वर्गीकरण छात्रों के व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाने हेतु काफी उपयोगी सिद्ध हुआ हैं। ब्लूम के वर्गीकरण के माध्यम से चलकर ही हम शिक्षण के उद्देश्यों की प्राप्ति कर सकतें हैं।

दोस्तों आज आपने जाना की ब्लूम का वर्गीकरण क्या हैं? (Bloom Taxonomy in Hindi) अगर आपको हमारी यह पोस्ट पसंद आयी हो। तो इस पोस्ट को अपने अन्य मित्रो के साथ अवश्य शेयर करें।


Monday, 3 October 2022

Ratanji Tata

I want to remember your face so that when I meet you in heaven,
So I can recognize you and thank you once again.
When Indian in a telephone interview
Billionaire Ratanji Tata was asked by a radio presenter:
"Sir, what do you remember when you found the happiest in life"?

Ratanji Tata said:
"I have gone through four stages of happiness in life, and I finally understood the meaning of true happiness."
The first stage was to accumulate wealth and resources.
But at this stage I didn't get the happiness I wanted.

Then came the second stage of collecting valuables and items.
But I realized that the effect of this thing is also temporary and the luster of precious things does not last long.
Then came the third phase of getting a big project. That was when I had 95% of the diesel supply in India and Africa. I was also the owner of the largest steel factory in India and Asia. But even here I did not get the happiness that I had imagined.

The fourth stage was when a friend of mine asked me to buy a wheel chair for some disabled children. There were about 200 children. At the behest of a friend, I immediately bought a wheel chair.

But the friend insisted that I go with him and present a wheel chair to the children. I got ready and went with them.
There I gave wheelchairs with my own hands to all the eligible children. I saw a strange glow of happiness on the faces of these children. I saw them all sitting on a wheel chair, roaming around and having fun.

It was as if they had reached a picnic spot where they were sharing the winnings of a big gift.
I felt real happiness inside me that day. When I was about to go back from there, one of those kids grabbed my leg.
I tried to gently release my leg, but the child did not let go and he looked at my face and held my legs tighter.
I leaned over and asked the child: do you need anything else?

Then the answer that the child gave me, not only shocked me but also completely changed my outlook towards life.

The child said-
 
"I want to remember your face so that when I meet you in heaven,
So I can recognize you and thank you once again."

The heart of the above splendid story is that we all should look into our inner self and must contemplate that, this life and the world and all the worldly activities
What will you be remembered for after leaving?

Would someone want to see your face again, it matters a lot?
Ratan Tata 25 years Ratan Tata 84 years

रतनजी टाटा

मैं आपका चेहरा याद रखना चाहता हूं ताकि जब मैं आपसे स्वर्ग में मिलूं, 
तो मैं आपको पहचान सकूं और एक बार फिर आपका धन्यवाद कर सकूं।
जब एक टेलीफोन साक्षात्कार में भारतीय 
अरबपति रतनजी टाटा से रेडियो प्रस्तोता ने पूछा:
"सर आपको क्या याद है कि आपको जीवन में सबसे अधिक खुशी कब मिली"?

रतनजी टाटा ने कहा:
"मैं जीवन में खुशी के चार चरणों से गुजरा हूं, और आखिरकार मुझे सच्चे सुख का अर्थ समझ में आया।"
पहला चरण धन और साधन संचय करना था। 
लेकिन इस स्तर पर मुझे वह सुख नहीं मिला जो मैं चाहता था।

फिर क़ीमती सामान और वस्तुओं को इकट्ठा करने का दूसरा चरण आया। 
लेकिन मैंने महसूस किया कि इस चीज का असर भी अस्थायी होता है और कीमती चीजों की चमक ज्यादा देर तक नहीं रहती।
फिर आया बड़ा प्रोजेक्ट मिलने का तीसरा चरण। वह तब था जब भारत और अफ्रीका में डीजल की आपूर्ति का 95% मेरे पास था। मैं भारत और एशिया में सबसे बड़ा इस्पात कारखाने मालिक भी था। लेकिन यहां भी मुझे वो खुशी नहीं मिली जिसकी मैंने कल्पना की थी.

चौथा चरण वह समय था जब मेरे एक मित्र ने मुझे कुछ विकलांग बच्चों के लिए व्हील चेयर खरीदने के लिए कहा। लगभग 200 बच्चे थे। दोस्त के कहने पर मैंने तुरन्त व्हील चेयर खरीद लीं।

लेकिन दोस्त ने जिद की कि मैं उसके साथ जाऊं और बच्चों को व्हील चेयर भेंट करूँ। मैं तैयार होकर उनके साथ चल दिया।
वहाँ मैंने सारे पात्र बच्चों को अपने हाथों से व्हील चेयर दीं। मैंने इन बच्चों के चेहरों पर खुशी की अजीब सी चमक देखी। मैंने उन सभी को व्हील चेयर पर बैठे, घूमते और मस्ती करते देखा।

यह ऐसा था जैसे वे किसी पिकनिक स्पॉट पर पहुंच गए हों, जहां वे बड़ा उपहार जीतकर शेयर कर रहे हों।
मुझे उस दिन अपने अन्दर असली खुशी महसूस हुई। जब मैं वहाँ से वापस जाने को हुआ तो उन बच्चों में से एक ने मेरी टांग पकड़ ली।
मैंने धीरे से अपने पैर को छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन बच्चे ने मुझे नहीं छोड़ा और उसने मेरे चेहरे को देखा और मेरे पैरों को और कसकर पकड़ लिया।
मैं झुक गया और बच्चे से पूछा: क्या तुम्हें कुछ और चाहिए?

तब उस बच्चे ने मुझे जो जवाब दिया, उसने न केवल मुझे झकझोर दिया बल्कि जीवन के प्रति मेरे दृष्टिकोण को भी पूरी तरह से बदल दिया।

उस बच्चे ने कहा था-
 
"मैं आपका चेहरा याद रखना चाहता हूं ताकि जब मैं आपसे स्वर्ग में मिलूं, 
तो मैं आपको पहचान सकूं और एक बार फिर आपका धन्यवाद कर सकूं।"

उपरोक्त शानदार कहानी का मर्म यह है कि हम सभी को अपने अंतर्मन में झांकना चाहिए और यह मनन अवश्य करना चाहिए कि, इस जीवन और संसार और सारी सांसारिक गतिविधियों
को छोड़ने के बाद आपको किसलिए याद किया जाएगा?

क्या कोई आपका चेहरा फिर से देखना चाहेगा, यह बहुत मायने रखता है ?
रतन टाटा 25 वर्ष रतन टाटा 84 वर्ष

महिषासुर मर्दिनी स्त्रोतम

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥

अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥

अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके 

कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥

सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥

अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥

कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥

कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥

दकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥


कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥

 तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥

अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥

Thursday, 29 September 2022

AK 47 कैसे काम करता है ?


The AK-47, as we know it, was created by Russian weapons designer Mikhail Timofeyevich Kalashnikov in 1947. Its name is derived from the word ‘automatic’ (A), the inventor’s last initial (K), and the year of its invention (47). The AK-47 was designed to be easy to operate, able to fire in any clime, durable, and mass produced quickly and cheaply. It was adopted into USSR military service in 1949 and quickly became a symbol of Soviet reach around the world.


It has a muzzle velocity of about 700 meters per second, can fire 600-rounds-per-minute at the cyclic rate, and hold a 30-round magazine of 7.62mm ammunition. The biggest issue with the weapon is accuracy, which is the result of large internal parts and powerful caliber rounds that reduce the max effective range to roughly 400m. Despite this weakness, the AK-47 has successfully infected many countries and facilitated the proliferation of communism and terror around the world.

Cycle of operations

The AK-47 is a fighter favorite around the world because its cycle of operations (the way it fires) is simple, made up of (relatively) large pieces that allow it to fire even when covered in sand or mud.


When the operator pulls the trigger, he/she releases the firing hammer, which strikes the firing pin. This action ignites the bullet primer which, in turn, ignites the gunpowder to fire the bullet. The gas that propels the bullet forward also pushes back on the bolt carrier assembly, ejecting the empty casing. This action also resets the hammer into firing position.

The bolt pulls a new round up from the magazine and inserts it into the barrel. The sear keeps the bolt hammer in place until the bolt carrier returns into position.

Mohar Magri

अकबर ने 1567 ई. में चित्तौड़गढ़ पर हमला करने के लिए तोपें चलवाई, लेकिन दुर्ग की ऊंचाई के कारण गोले किले तक नहीं जा सके। फिर उसने हज़ारों सिपाहि...