अकबर ने 1567 ई. में चित्तौड़गढ़ पर हमला करने के लिए तोपें चलवाई, लेकिन दुर्ग की ऊंचाई के कारण गोले किले तक नहीं जा सके। फिर उसने हज़ारों सिपाहियों और मजदूरों को किले के अंतिम छोर के निकट ही रेत का पहाड़ बनाने का हुक्म दिया।
अबुल फजल द्वारा लिखित वर्णन के अनुसार इस काम में राजपूतों के तीरों से हर रोज मुगल पक्ष के कई आदमी मारे जाते।
एक वक्त ऐसा आया जब मजदूरों ने काम करना मना कर दिया, तब अकबर ने उनको एक टोकरी रेत के बदले एक मुहर देकर रेत का पहाड़ बनवाया, जिसे आज "मोहर मगरी" के नाम से जाना जाता है।
इस रेत के पहाड़ पर कई जोड़ी बैलों से खिंचवाकर तोपें चढ़ाई गई और किले के अंदर गोले दागे गए।
